नयी पीढ़ी को सलाम

डंडों, घूंसों, बूटों, ‘कमेंटों’ का जिस अंदाज में जवाब दिया,

क्रूर पुलिसिया मानसिकता का जिस बेबाकी से पर्दाफ़ाश किया,

दमन के खतरनाक इरादों का जैसा मज़ाक उड़ाया,

और अहंकारी सत्ता को घुटनों पर ला टिकाया,

गोदी मीडिया के रचे प्रपंचों को जैसे नंगा किया,

उत्पीड़न-दमन को जिस ढंग से हँसी-ठठ्ठे में उड़ाया,

सचेतन भारत-भारतीयता की जो बुलंद झलक दिखाई,

न्यायोचित माँगों पर जो संकल्प, एकता और बंधुता दर्शायी….

ऐ नयी पीढ़ी!

तुम्हारी उस ज़िद, तेवर और इस बुलंद जज़्बे को

सलाम/नमस्ते/ प्रणाम!


– दीपक भारती (25.07.2026)

विदाई  गीत

यह देश, यह माटी, यह नदी, पहाड़,

जन, जंगल और ज़मीन…

और यह उमड़ता-घुमड़ता जन-सैलाब,

सब कुछ हमारा है! सब कुछ हमारा है!….

‘हम भारत के लोग’ — यह नारा हमें प्यारा है।

वे कोशिश करके बाँट सकें तो बाँटें,

नफ़रत की फ़सल काट सकें तो काटें!

पर सत्ता के कुत्सित इरादों से टकराने,

एकता का परचम लहराने…. 

हर जन-संघर्ष के मोर्चे पर—

हम जुटेंगे साथी, हम लड़ेंगे साथी

हम मिलेंगे साथी, फिर मिलेंगे साथी, फिर मिलेंगे….

जन-संघर्ष के पथ पर हम फिर मिलेंगे॥

                                                               
– दीपक भारती (26.07.2026)

बस इतनीसी गुज़ारिश

मैं शोषित, विपन्न जनता का एक अदना सा व्यक्ति हूँ,

और तुम उस संपन्न ‘एक फ़ीसदी’ का दमदार किरदार हो!

तुम्हारी बनाई ताकत की इस व्यवस्था में—

मेरी स्थिति चींटी-सी है तो तुम हो मदमस्त हाथी ।

तुम्हारी एक चिंघाड़ के सामने

हमारे लाखों-करोड़ों का क्रंदन कुछ भी नहीं,

तुम जब चाहते हो हमें कुचलते हो,

बेरहमी से हमारे आशियाने को रौंदते हो।

हम बहुसंख्यक होकर भी तुम्हारा कुछ बिगाड़ नहीं पाते,

तुम मुट्ठी भर के सामने हम झुंड के झुंड लाचार हैं

क्योंकि शक्ति एवं संपन्नता आधारित इस संतुलन में

तुम हाथियों के समक्ष हमारी बिसात कुछ भी नहीं।

तुम्हारी इस शक्ति-केंद्रित व्यवस्था में—

समता, समानता, बंधुत्व, न्याय………..

सब महज़ ऊपरी दिखावा है!

यह कानून,अदालत, पुलिस, फौज, अमला…. 

सब कुछ तुम्हारे लिए और तुम्हारा है, 

हमारे हिस्से तो सिर्फ छलावा है।

इसलिए ऐ हुज़ूर!

बस इतनी-सी गुज़ारिश है,

तुम्हारे रहमों-करम पर टिकी इस क्रूर व्यवस्था को—

मेहरबानी करके ‘लोकतंत्र’ का नाम न दो॥ 


– दीपक भारती (03.07.2026)

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