संघर्षों में भारतीय महिलाओं का इतिहास’ विषय पर ये नोट्स मुख्यतः 19वीं और 20वीं शताब्दी के आंदोलनों से संबंधित हैं, साथ ही इनमें समकालीन आंदोलनों को भी शामिल किया गया है। जब हम संघर्षों की बात करते हैं, तो हमारा आशय केवल उन आंदोलनों से होता है जिन्होंने समाज को आगे बढ़ाने में मदद की। इस बात को साफ-साफ समझना ज़रूरी है, ख़ासतौर पर इसलिए कि हमारे देश में अनेक प्रतिगामी, धार्मिक संकीर्णतावादी आंदोलन भी मौजूद हैं। हालांकि नोट्स में उल्लेखित आंदोलनों की अपनी सीमाएँ थीं, लेकिन महिलाओं के लिए वे निश्चित रूप से एक कदम आगे के थे। इन्होंने सदियों से भारतीय महिलाओं को क्रूरता से जकड़े हुए अनेक सामंती बंधनों को तोड़ने में मदद की। वे भारत के लोगों के लोकतांत्रिक जागरण का एक हिस्सा हैं। वे यह दर्शाते हैं कि केवल उपदेश देने या बहस-मुबाहिसों से महिलाओं की मुक्ति नहीं हो सकती, सीधी कार्रवाई ही इसका प्रमुख तत्व है। वे यह सिद्ध करते हैं कि इस शोषणकारी समाज में दमनकारी संबंधों को बदलने के लिए वर्ग-संघर्ष को अमल में लाना ही एकमात्र रास्ता है।
समाज और महिलाओं की स्थिति में बदलाव लाने में महिलाओं की भूमिका को समझने के लिए हमने सामान्य आंदोलनों के साथ-साथ महिला आंदोलनों को भी शामिल किया है। महिलाओं की पहचान केवल ‘महिला’ होने तक सीमित नहीं है। वास्तव में वे विभिन्न वर्गों और तबकों से संबंधित होती हैं। इसलिए जब हम महिलाओं के दमन और शोषण की बात करते हैं, तो उसका मतलब केवल औरत होने के नाते उनके साथ होने वाला दमन नहीं, बल्कि किसान, मजदूर, कारीगर और नागरिक के रूप में उनके शोषण से भी है। इसी कारण हमें इन नोट्स में आम आंदोलनों और महिला आंदोलनों- दोनों को शामिल करना ठीक लगा। वास्तव में, आम आंदोलनों के हिस्से के रूप में महिलाओं से जुड़े मुद्दों (या पितृसत्ता) पर संघर्ष हुए हैं और कई बार महिला आंदोलनों ने आम मुद्दों को भी उठाया है। इसमें एक द्वंद्वात्मक संबंध है और इन सभी प्रकार के दमन और शोषण के खि़लाफ़ संघर्ष किए बिना महिलाओं की मुक्ति संभव नहीं है। इसलिए, बदलाव के लिए जब हम महिलाओं के संघर्षों के इतिहास को दर्ज करना चाहते हैं, तो इन दोनों प्रकार के आंदोलनों के बारे में लिखना उपयुक्त है।
वास्तव में जन-इतिहास अदृश्य रहता है, खासतौर पर जन-इतिहास के हिस्से के रूप में महिलाओं का इतिहास सामंती/बुर्जुआ इतिहास-लेखन पद्धति के कारण दोहरे स्तर पर अदृश्य हो जाता है। इस इतिहास को पुनः प्राप्त करने में केवल नारीवादी दृष्टिकोण से देखने की सीमाओं के बावजूद, नारीवादियों के योगदान को स्वीकार किया जाना चाहिए। अब तक, संभवतः स्त्री शक्ति संगठन की तेलंगाना संघर्ष में महिलाओं की भागीदारी पर लिखी किताब को छोड़कर, अधिकांश लेखन में वामपंथी महिला आंदोलनों को काफी हद तक या पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया गया है।
वाम/संशोधनवादी धाराओं को अपने आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका को ठीक से दर्ज न करने की ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए, जो कुछ हद तक आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका को पहचान न पाने का परिणाम है। वामपंथी महिलाओं ने या तो वामपंथी आंदोलनों में अपनी भागीदारी के बारे में लिखा, या 1947 से पहले के आम आंदोलनों के बारे में, जिससे आधुनिक भारतीय इतिहास में महिलाओं की भूमिका की समग्र तस्वीर सामने नहीं आती। उनके द्वारा महिलाओं की भूमिका को परिप्रेक्ष्य में रखने, यानि वर्तमान को आगे बढ़ाने के लिए अतीत का विश्लेषण करने या अपने समय के सामाजिक उथल-पुथल के हिस्से के रूप में उसे समझने का कोई प्रयास नहीं हुआ।
उत्तर-पूर्व के महिला आंदोलनों या राष्ट्रीयता आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी के बारे में हमें जो जानकारी मिल सकी, वह बहुत सीमित है, जबकि यह सब हाल -फिलहाल का इतिहास है। जैसे-जैसे हमें अधिक जानकारी मिलेगी, हम उनकी बहादुराना भूमिका और त्याग के बारे में और सामग्री शामिल करने की उम्मीद रखते हैं।
इतिहासकारों द्वारा समकालीन नक्सलवादी आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका को दर्ज करने का लगभग कोई प्रयास नहीं किया गया है, जबकि इन आंदोलनों ने दक्षिणी, मध्य और पूर्वी भारत के बड़े इलाकों में महिला आंदोलनों का निर्माण किया है। इन आंदोलनों का नेतृत्व करने वाली पार्टियाँ भी कुछ संगोष्ठियों के पत्रों और पत्रिकाओं के लेखों को छोड़कर कोई समग्र इतिहास प्रस्तुत नहीं कर पाई हैं। एक बार जब आंदोलनों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचाना गया, तो इसे दर्ज करने के लिए अधिक प्रयास किए गए। यह सराहनीय है कि क्रांतिकारी महिला संगठन नियमित रूप से महिलाओं की भूमिका दर्ज करने के लिए महिला बुलेटिन और पत्रिकाएँ निकाल रहे हैं। ये पत्रिकाएँ केवल संघर्षों की रिपोर्ट ही नहीं देतीं, बल्कि महिलाओं के सामने आने वाली विभिन्न समस्याओं और उनके समाधान पर चर्चा भी करती हैं। जिन समस्याओं को चर्चा के लिए उठाया जाता है और जिन समाधानों की पेशकश की जाती है, वे महिला आंदोलनों के मकसद और उन क्रांतिकारी आंदोलनों का चित्र प्रस्तुत करते हैं, जिनका वे हिस्सा हैं।
कुल मिलाकर, इस विषय पर सामग्री की कमी है और जहाँ उपलब्ध भी है, वहाँ वह क्षेत्रों और समय-काल के अनुसार असमान रूप से बंटी हुई है।
पिछले तीन दशकों में महिला अध्ययन विभागों के बड़े पैमाने पर उभरने के बाद, विभिन्न संगठनों और विश्वविद्यालयों द्वारा कुछ मुद्दों पर और कुछ नेतृत्वकर्ता महिलाओं के जीवन पर गहन शोध के लिए अनेक परियोजनाएँ शुरू की गई हैं। एक स्तर पर, इन परियोजनाओं से प्राप्त जानकारी हमें खंडित तस्वीर या बहुत उच्च स्तर की अंतर्दृष्टि देती है, लेकिन वह समग्र दृष्टि प्रदान करने में विफल रहती है। किसी विशेष मुद्दे के सूक्ष्मतम विवरण देते हुए, वे अक्सर ‘पेड़ों के कारण जंगल’ को नहीं देख पातीं। कुछ अध्ययन अत्यधिक अकादमिक हैं और आधुनिक भारत में महिला आंदोलनों के इतिहास में रुचि रखने वाले सामान्य पाठक तक पहुँचने में असफल रहते हैं।
अभिजात वर्गीय दृष्टिकोण का प्रभुत्व इस बात से ज़ाहिर होता है कि अधिकतर इतिहासकार मध्यवर्गीय महिलाओं की संघर्षों में भागीदारी को मुख्यतः महिलाओं की शिक्षा या सामाजिक सुधार आंदोलन से जोड़ते हैं और किसानों व मजदूर वर्ग की बड़ी संख्या में शामिल महिलाओं- जिसमें वेश्याएँ भी शामिल थीं- की प्रत्यक्ष भागीदारी को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। साथ ही उन हज़ारों गृहिणियों- अधिकतर माओं और पत्नियों- की भूमिका को भी नज़रअंदाज़ कर देते हैं, जिन्होंने अपने पुरुषों के जेल जाने या मारे जाने पर परिवार की ज़िम्मेदारियाँ उठाकर स्वतंत्रता आंदोलन को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया।
हमारी सामान्य पाठ्यपुस्तकें या अकादमिक इतिहास की किताबें (लगभग सभी) लैंगिक पक्षपात प्रदर्शित करती हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि हममें से अधिकांश ने कई महिला नेताओं के बारे में तब सुना या सीखा, जब महिला आंदोलन में हमारी रुचि विकसित हुई और हमने उससे सम्बन्धित कुछ किताबें पढ़ीं। उनका इतिहास हमारी सामूहिक स्मृति का हिस्सा नहीं है, क्योंकि हमें कहीं भी उनके बारे में पढ़ाया ही नहीं जाता। अकादमिक किताबें वर्गीय पक्षपात भी दिखाती हैं। इसलिए, जब भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका दर्ज की जाती है, तो केवल उच्च वर्ग/उच्च जाति की महिलाओं और कांग्रेस नेताओं के योगदान को ही दर्ज किया जाता है, जबकि साधारण दलित/किसान/मजदूर महिलाओं की भूमिका, पुलिस दमन के सामने उनके साहस, उनके द्वारा झेली गई सामाजिक बदनामी और घर चलाने तथा आंदोलनों में भाग लेने के दोहरे बोझ से निपटने के लिए किए गए अथक प्रयास का बहुत कम ज़िक्र मिलता है। इतिहास के सभी अंधेरे कोनों को उजागर करना और इन औरतों की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करना हमारा काम है।
ऐसे कई अन्य जन-उभार भी थे, जिनमें से कुछ तो ब्रिटिश शासन और उसके सामाजिक-आर्थिक परिणामों के खि़लाफ़ विद्रोहों में भी बदल गए, लेकिन इन विद्रोहों के पास लेखक- यानि अत्यधिक शिक्षित नया मध्यवर्ग, जो सामाजिक व्यवस्था का अगुआ भी था और उसका उत्पाद और लाभार्थी भी- जो इसे रिकॉर्ड करें और प्रचारित करें- नहीं थे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना से पहले हुए किसान विद्रोहों में महिलाओं की भूमिका को इस मौजूदा काम में भी दर्ज नहीं किया जा सका है, जो इसकी एक बड़ी कमी है। जैसे-जैसे हमें जानकारी मिलेगी, हम उसे जोड़ेंगे। हम पाठकों से अनुरोध करते हैं कि यदि इस विषय पर कोई जानकारी उपलब्ध हो, तो हमें भेजें।
19वीं शताब्दी की शुरुआत से ही, आदिवासियों को उनके प्राकृतिक रिहाइष से बेदखल करने और उनकी आजीविका के पारंपरिक साधनों को छीनने वाली आदिवासी विरोधी ब्रिटिष नीतियों के कारण आदिवासियों ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ आक्रोश व्यक्त किया, उनके विरुद्ध अनेक आदिवासी विद्रोह हुए। लगभग ये सारे सशस्त्र विद्रोह थे और इनमें औरतों की बड़ी भागीदारी थी। इन सभी विद्रोहों में आदिवासी महिलाओं की भूमिका न तो दर्ज की गई है और न ही उस पर समुचित शोध हुआ है। रानी गैदिन्ल्यू की कहानी एक अपवाद है, क्योंकि वह कम से कम विद्वानों की कुछ पुस्तकों में स्थान पाती हैं।
अन्य आंदोलनों की तरह ही, सामाजिक सुधार आंदोलनों के संदर्भ में भी हमें महिला समाज सुधारकों के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है, लेकिन चूँकि उनके कामों का किसी न किसी रूप में दस्तावेजीकरण हुआ है, इसलिए उनकी भूमिका के बारे में जानकारी मिल सकी है। सामाजिक सुधार का दौर उस समय से मिलता है, जब महिलाओं ने लिखना भी शुरू किया। इसलिए उनके लिखित अनुभव उनके कामों और उनके समय के बारे में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं।
1947 से पहले के आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी पर लिखते समय, अंबेडकर के नेतृत्व में चले जाति-विरोधी आंदोलनों में दलित महिलाओं की भूमिका को अधिकांश इतिहासकारों ने नज़रअंदाज़ किया है। यह कमी 1947 के बाद के आंदोलनों में दलित महिलाओं की भूमिका के संदर्भ में आज तक बनी हुई है। उनकी भूमिका का आकलन करने के लिए हमें औपनिवेशिक काल के जाति-विरोधी आंदोलनों को देखना होगा। उर्मिला पवार और मीनाक्षी मून ने अंबेडकर के आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका पर एक किताब लिखी है, जो इस विषय पर अब तक का सबसे बेहतरीन दर्ज स्रोत है। चूँकि यह मराठी में है, हम उस किताब की सामग्री का इस्तेमाल नहीं कर सके, अगर कर पाते, तो यह अध्याय और अधिक समृद्ध हो जाता।
कुछ किताबों में कुछ उच्च-स्थिति वाली अल्पसंख्यक महिलाओं (मुस्लिम और ईसाई) का कुछ हद तक उल्लेख मिलता है, लेकिन साधारण महिलाओं की भूमिका के बारे में बहुत कम लिखा गया है। मुस्लिम महिलाओं की भूमिका को केवल एआईडब्ल्यूसी (अखिल भारतीय महिला सम्मेलन) से उनके अलग होने और मुस्लिम लीग के गठन तक ही दर्ज किया गया है। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभिक वर्षों में और भारत में महिलाओं के लिए अलग संगठनों के गठन में कुछ विदेशी ईसाई महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।
राष्ट्रीय क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं के बारे में कुछ साहित्य उपलब्ध है, लेकिन वह आसानी से सुलभ नहीं है। उसका अधिकांश भाग मुद्रण से बाहर है या पहुँच से दूर है। उसका कुछ हिस्सा बंगाली में है। लेकिन चूँकि उनका संघर्ष मुख्यतः ब्रिटिश शासन के विरुद्ध था और उसे कुछ हद तक दर्ज किया गया, इसलिए हम इन नोट्स में उसके बारे में जानकारी दे सके। चूँकि इन महिलाओं ने अपने संघर्ष की रणनीति के रूप में सशस्त्र कार्रवाई को अपनाया, इसलिए हमारी अधिकांश पाठ्यपुस्तकें उन्हें कोई विशेष महत्व नहीं देतीं- अधिकतर तो दरअसल उनका शायद ही उल्लेख करती हैं। भगत सिंह को, लोगों के दिलों में उनकी शहादत और दृष्टि के कारण, नज़रअंदाज नहीं किया जा सका, इसलिए उनका अनिच्छापूर्वक उल्लेख किया जाता है। लेकिन महिला क्रांतिकारियों को सुविधाजनक ढंग से नज़रअंदाज कर दिया जाता है।
कम्युनिस्ट-नेतृत्व वाले सशस्त्र संघर्षों में दलित, किसान, अल्पसंख्यक और आदिवासी महिलाओं की भूमिका को कुछ हद तक कम्युनिस्ट महिलाओं और वाम-झुकाव वाले पुरुषों ने दर्ज किया है। कुछ महान महिला ट्रेड यूनियन नेताओं के बारे में भी कुछ जानकारी उपलब्ध है। लेकिन सिवाय इक्का-दुक्का लेखों के, ट्रेड यूनियन संघर्षों में महिला मजदूरों की भूमिका का विस्तृत रिकॉर्ड कहीं नहीं मिलता। वामपंथियों/ संशोधनवादियों द्वारा मजदूर संघर्षों के इतिहास पर लिखी पुस्तकों में महिला मजदूरों के संघर्षों का कोई उल्लेख नहीं मिलता। कुछ अध्यायों में कारखानों में उनकी दुर्दशा का उल्लेख है, लेकिन संघर्षों में उनकी भूमिका पर ध्यान नहीं दिया गया। वास्तव में, इन आंदोलनों से कई महिला नेता उभरीं।
स्वायत्त महिला आंदोलन (एडब्ल्यूएम) असंख्य छोटे समूहों से मिलकर बना है, जो 1980 के बाद से देश के विभिन्न हिस्सों में कुछ बड़े राष्ट्रीय स्तर के अभियानों या आंदोलनों के साथ-साथ स्थानीय महिलाओं के मुद्दों को उठाते रहे हैं। इन गतिविधियों की असंख्य रिपोर्टें बड़ी संख्या में पत्रिकाओं या सेमिनार पेपरों में बिखरी हुई हैं। कुछ किताबें भी उन्होंने लिखी। इस मामले में दस्तावेजीकरण की कोई समस्या नहीं है, क्योंकि इस आंदोलन का हिस्सा बनने वाली महिलाएँ न केवल शिक्षित हैं, बल्कि रिकॉर्ड करने की ज़रूरत के प्रति भी सचेत हैं। वास्तव में, दस्तावेजीकरण इतना बारीक है कि कभी-कभी छोटे आंदोलनों का भी रिकॉर्ड बन जाता है और वे शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध हो जाते हैं या अकादमिक जगत में लोकप्रिय हो जाते हैं, जबकि बड़े पैमाने के कुछ आंदोलनों को मान्यता नहीं मिलती, क्योंकि उनका दस्तावेजीकरण नहीं हुआ। चूँकि यहाँ सभी अभियानों (या आंदोलनों) की सूची देना संभव नहीं है, इसलिए केवल कुछ का ही उल्लेख किया गया है।
इन नोट्स के लिए जानकारी जुटाने में बहुत समय और प्रयास लगा। सभी सूचनाओं को एक साथ लाने का यह प्रयास पहली बार है। यह किसी भी तरह से पूर्ण नहीं है, बल्कि केवल एक विनम्र शुरुआत है। हम भविष्य में पाठकों के सुझावों और योगदानों से इन नोट्स को समृद्ध करना चाहेंगे। सामग्री में किसी भी प्रकार के जोड़ या परिवर्तन के लिए सुझाव आमंत्रित हैं।
पुरुष सदस्यों और नेताओं के पितृसत्तात्मक विचारों के विरुद्ध महिलाओं का संघर्ष सभी सामान्य आंदोलनों की एक सामान्य विशेषता है। कुछ में यह अधिक तेज हो सकता है, और कुछ में कमज़ोर। कभी-कभी इसमें समग्र दृष्टि का अभाव हो सकता है, और कभी इसे सैद्धांतिक रूप से बेहतर ढंग से संबोधित किया गया हो सकता है। इस संघर्ष का पैमाना, तीव्रता या स्पष्टता चाहे जो भी हो, यह अपरिहार्य है। जब तक महिलाएँ समाज में पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष नहीं करतीं, तब तक वे आंदोलनों में भाग नहीं ले सकतीं। इसलिए उनका संघर्ष वहीं से शुरू होता है, क्योंकि वे अपने द्वारा उठाए गए किसी भी काम को करते समय किसी न किसी रूप में पितृसत्तात्मक दमन का सामना करती हैं और उसके विरुद्ध लड़े बिना आगे नहीं बढ़ सकतीं। चूँकि महिला आंदोलन पितृसत्ता से लड़ने के लिए ही उत्पन्न हुए, इसलिए यह कहना स्वाभाविक है कि वही उनका मुख्य लक्ष्य है। अतः कुल मिलाकर, हम पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष को महिला आंदोलनों के इतिहास से अलग नहीं कर सकते।
चाहे वे राष्ट्रवादी क्रांतिकारी हों या कम्युनिस्ट महिलाएँ, उन्हें सशस्त्र कार्रवाइयों में सक्रिय भागीदार बनने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा। किसके साथ?- अपने नेताओं, मार्गदर्शकों और साथियों के साथ। हालांकि उन्हें संघर्ष में सहयात्री के रूप में स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया गया, लेकिन नेतृत्वकारी भूमिकाएँ या पद हासिल करना आसान नहीं था। उनके पुरुष साथियों का विरोध संरक्षणवाद से लेकर महिलाओं की हीन स्थिति पर आधारित पितृसत्तात्मक विचारों तक फैला हुआ था। महिलाओं का श्रेय है कि उन्होंने न केवल इन विचारों से वैचारिक स्तर पर लड़ाई लड़ी, बल्कि उन कामों में अपनी क्षमता भी सिद्ध की, जिन्हें महिलाओं के लिए असंभव माना जाता था। प्रीतिलता का मृत्युकथन वास्तव में उस पीड़ा को उजागर करता है, जिसमें उन्हें यह सिद्ध करना पड़ा कि महिलाएँ भी देश की आज़ादी के लिए पुरुषों के समान षहादत देने में सक्षम हैं। तेलंगाना संघर्ष में भाग लेने वाली महिलाओं की गवाही इस बात का सबसे अच्छा प्रमाण देती है कि उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ा और अपने पुरुष साथियों के पितृसत्तात्मक विचारों के खि़लाफ़ उन्हें किस प्रकार का संघर्ष करना पड़ा।
कांग्रेस की महिलाओं ने भी कुछ हद तक अपने पुरुष सहकर्मियों और नेताओं के पितृसत्तात्मक विचारों के ख़िलाफ़ संघर्ष किया। विशेषकर मृदुला साराभाई जैसी नेताओं ने ऐसे रवैयों के खि़लाफ़ आवाज़ उठाई और उनकी खुलकर निंदा की। इसे बुर्जुआ ढाँचे के भीतर समान अधिकारों के लिए बुर्जुआ महिलाओं के उदय के रूप में देखा जाना चाहिए। महिलाओं ने नमक सत्याग्रह का हिस्सा बनने का अधिकार गांधी से बहस करके जीता, जिन्होंने इस काम के लिए एक भी महिला को नहीं चुना था। यहाँ तक कि भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान भी, महिलाओं ने उनके निर्देशों की अवहेलना की और तोड़फोड़ की गतिविधियों का नेतृत्व करने के लिए भूमिगत हो गईं। वास्तव में, गांधीवाद की संरचना खुद पितृसत्ता की आलोचना की अनुमति नहीं देता। इसलिए कांग्रेस में महिलाओं द्वारा अपने नेताओं की अवहेलना के ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं। इसके विपरीत, माक्र्सवाद और सशस्त्र संघर्ष की विचारधारा ने साधारण किसान महिलाओं को अपनी जंज़ीरें तोड़ने और यहाँ तक कि अपने नेताओं के पितृसत्तात्मक रवैयों पर भी प्रश्न उठाने की इजाज़त दी।
1950 से पहले कम्युनिस्ट-नेतृत्व वाले आंदोलनों में भाग लेने वाली महिलाओं की बड़ी संख्या ने, अपने वर्ग-स्वभाव के अनुरूप, उत्पीड़कों- चाहे वे जमींदार हों या अंग्रेज़- के सशस्त्र खात्मे की आकांक्षा रखी। वास्तव में, उनके कठोर अनुशासन, उत्साह और सबसे बढ़कर सशस्त्र संघर्ष को शुरू करने और जारी रखने की उनकी पहल को देखकर आश्चर्य होता है। श्रमजीवी औरतों की यह खूबी उस समय के सभी विद्रोहों- तेभागा, तेलंगाना, वरली आदि में दिखाई देती है। वे न केवल सशस्त्र संघर्ष का हिस्सा थीं, बल्कि उसका नेतृत्व करने के लिए भी तैयार थीं। इतिहास में गहराई से उतरने पर यह देखकर आश्चर्य होगा, कि 1857 से लेकर आज तक, महिलाओं ने अंग्रेज़ों या स्थानीय जमींदारों जैसे उत्पीड़कों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष या कम से कम सशस्त्र प्रतिरोध की इच्छा को विभिन्न तरीकों से व्यक्त किया है। यह गांधी के उस आधारभूत विचार के बिल्कुल विपरीत है कि महिलाएँ अहिंसक संघर्ष के लिए अधिक उपयुक्त होती हैं। तथ्य यह है कि असंख्य महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं, जिन्होंने गांधी के अहिंसा मार्ग को तिरस्कृत किया और सशस्त्र कार्रवाइयों को अपनाया। अंग्रेज़ों को आतंकित करने में अपनी भूमिका के लिए उनमें से कई प्रशंसा और पहचान के बगैर गुमनाम रहीं। महिलाओं ने समझ लिया कि उनकी मुक्ति के लिए सशस्त्र संघर्ष अनिवार्य है। यही कारण है कि जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व ने सशस्त्र संघर्ष को वापस लेने और संसदीय राजनीति का हिस्सा बनने का निर्णय लिया, तो पार्टी की महिलाओं ने इसका कड़ा विरोध किया, क्योंकि किसी भी और से ज़्यादा वे अपनी हासिल उपलब्धियों को खोने वाली थीं। महिलाओं के लिए यह लड़ाई केवल आर्थिक शोषण के खि़लाफ़ ही नहीं, बल्कि पितृसत्तात्मक दमन के खि़लाफ़ भी थी। सशस्त्र संघर्ष की वापसी न केवल जनवादी क्रांति के लिए, बल्कि महिलाओं की मुक्ति के संघर्ष के लिए भी एक बड़ा आघात थी।
सामान्यतः महिलाओं का इतिहास सामान्य इतिहास में समाहित नहीं किया जाता। यह गलती अक्सर वाम/संशोधनवादी पार्टियाँ भी करती हैं। इसलिए हम आज भी महिलाओं की वास्तविक ऐतिहासिक भूमिका का मूल्यांकन करने के लिए अँधेरे में टटोल रहे हैं। महिलाओं को इतिहास में यदि उनका उचित हिस्सा दिया गया होता, तो सिर्फ विवरण जुटाने भर के लिए ही एक अलग या विस्तृत अध्ययन आवश्यक होता। चूँकि ऐसा नहीं हुआ, इसलिए हमें उनकी भूमिका का मूल्यांकन करने और उनके योगदान के व्यौरे जानने के लिए ये नोट्स लिखने पड़े। इन नोट्स को लिखने के अंत में हमारे मन में एक ज़रूरी सवाल उठा- ऐसे लेखन का मानदंड क्या होना चाहिए? क्या हमें महिलाओं का इतिहास अलग से लिखना चाहिए? वास्तव में, हमें महिलाओं के इतिहास को आम इतिहास का अभिन्न अंग बनाकर लिखने का प्रयास करना चाहिए। जब किसी विशेष विषय पर विस्तृत अध्ययन की ज़रूरत हो- जैसे छात्रों की भूमिका या आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका- केवल तभी उसे अलग से लिखा जा सकता है और लिखा जाना चाहिए। महिलाओं की भूमिका पर अलग अध्ययन निस्संदेह ज़रूरी हैं, लेकिन यदि उसका दूसरा पक्ष- यानि आम इतिहास के साथ उसके एकीकरण को नज़रअंदाज़ कर दिया जाए, तो मक़सद आधा ही पूरा होता है।
जब हम इतिहास को वर्ग-संघर्षों के इतिहास के रूप में देखते हैं, तो यह स्वाभाविक है कि दास विद्रोहों से लेकर सभी वर्ग-संघर्षों में महिलाएँ शामिल रही हैं। लेकिन जब हम इन आंदोलनों से उभरी महिला नेताओं के नाम खोजते हैं, तो वे बहुत कम मिलते हैं। महिला नेताओं को दुर्लभ अपवाद के रूप में देखा जाता है, ‘स्वाभाविक’ नेताओं के रूप में नहीं- जैसा कि पुरुषों के साथ होता है। 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति से उत्पन्न सामाजिक उथल-पुथल और अंततः बुर्जुआ वर्ग द्वारा सामंती वर्ग के पतन ने महिलाओं के जीवन में भी बड़े परिवर्तन किये। बुर्जुआ और श्रमिक वर्गों का उदय तथा सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल, बुर्जुआ-नेतृत्व वाले महिला आंदोलनों और श्रमिक वर्ग की महिलाओं के आंदोलनों को जन्म देने वाले कारक बने। यूरोप और अमेरिका में पूँजीवाद के विकास और इसके परिणाम स्वरूप परिवारों में आये परिवर्तनों ने वे भौतिक परिस्थितियाँ पैदा कीं और उन अंतर्विरोधों को तीखा किया, जिनके भीतर समान अधिकारों की मांग वाला महिला आंदोलन उभरा। महिलाओं की मुक्ति का आंदोलन- महिलाओं का और महिलाओं के लिए आंदोलन- पूँजीवाद के विकास के बाद ही उभरा। पिछली दो सदियों के महिला आंदोलन, व्यापक आर्थिक और राजनीतिक संघर्षों के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े रहे हैं और उनका हिस्सा रहे हैं। इसके बाद हम सभी आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी में अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी और परिणामस्वरूप महिला नेताओं की संख्या में बढ़ोत्तरी देखते हैं।
19वीं और 20वीं शताब्दी में, अमेरिका और यूरोप में महिलाओं का समान अधिकारों के लिए संघर्ष, ट्रेड यूनियन और समाजवादी आंदोलनों के साथ-साथ बढ़ा। रूसी क्रांति की जीत और वहाँ महिलाओं को दिए गए अधिकारों का महिला आंदोलन पर गहरा प्रभाव पड़ा। औपनिवेशिक देशों में महिला आंदोलन व्यापक साम्राज्यवाद- विरोधी उभार और सामंती दमन के खि़लाफ़ संघर्ष के भीतर विकसित हुआ। इनमें महिलाओं की मुक्ति के मामले में भी सबसे सफल चीनी क्रांति रही।
एक ओर जहाँ बुर्जुआ महिला आंदोलन (जिसे पहली और दूसरी लहर का नारीवाद कहा जाता है) की समाज परिवर्तन में गंभीर सीमाएँ थीं, वहीं क्रांतिकारी आंदोलनों को भी पितृसत्ता की पहचान करने और उसके विरुद्ध निरंतर संघर्ष करने में कुछ समस्याएँ रहीं। लेकिन जब हम इन दोनों अनुभवों को देखते हैं, तो पाते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलनों में महिलाओं की बड़ी संख्या में सक्रिय भागीदारी से और समाजवादी देशों में उसकी निरंतरता की वजह से ही बड़े पैमाने पर बेहतर और अधिक मूलभूत परिवर्तन हासिल हुए। हालांकि नारीवादी आंदोलन को पितृसत्ता के विभिन्न पहलुओं को दुनिया की सोच में लाने का श्रेय दिया जा सकता है, ठोस रूप में उसके द्वारा लाए गए परिवर्तन सीमित रहे, क्योंकि अधिकांश देशों में सत्ता सामंती और बुर्जुआ वर्गों के हाथों में रही।
भारत में भी हम पाते हैं कि वर्ग-संघर्षों और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्षों में महिलाओं की भागीदारी ने समाज और महिलाओं की स्थिति में अधिक बदलाव किये, जबकि केवल महिलाओं के मुद्दों पर हुए संघर्ष समाज और महिलाओं की स्थिति में बहुत अधिक बदलाव नहीं ला सके, हालांकि उन्होंने निश्चित रूप से महिलाओं के मुद्दों को पहचान दिलाने में मदद की। इसका कारण यह है कि सत्ता अब भी अत्यंत पितृसत्तात्मक सामंती और दलाल शासक वर्गों के हाथों में केंद्रित है।
इसलिए महिलाओं की मुक्ति के लिए सत्ता का सवाल बेहद महत्वपूर्ण है। जब तक सत्ता उत्पीड़ित और शोषित वर्गों के हाथों में नहीं आती, तब तक महिलाओं की मुक्ति की कोई संभावना नहीं है। कम्युनिस्ट-नेतृत्व वाले किसान आंदोलनों में वे संक्षिप्त अवधि, जब सत्ता लोगों के हाथों में आई, ने एक नए समाज की झलक दी, जहाँ शोषित वर्ग शासन करता था- और शोषितों में महिलाएँ भी शामिल थीं। इन अनुभवों से हमें यह समझ मिली कि महिलाओं के पास कितनी ताकत थी, शोषित महिलाओं के हाथों में सत्ता कैसे आती है, महिलाओं के एजेंडे को आंदोलन में शामिल करने के लिए और कितना संघर्ष तथा कौन-से अतिरिक्त कदम ज़रूरी हैं, और उन्हें मुक्ति के और क़रीब लाने के लिए क्या-क्या किया जाना चाहिए।
नोट्स के माध्यम से हम महिलाओं के नेतृत्व के सवाल से भी रूबरू होते हैं। इन सभी आंदोलनों में महिला नेताओं का बहुत बड़ा हिस्सा इस बात को निर्विवाद रूप से साबित करता है कि महिलाएँ बेहद सक्षम नेता हैं, यहां तक कि पुरुषों से भी बेहतर प्रदर्शन करती हैं। लेकिन इसके साथ ही आंदोलनों में भाग लेने वाली महिलाओं की कुल संख्या की तुलना में नेताओं का अनुपात बहुत कम है। यह औरतों पर सदियों पुराने दमन का परिणाम है। इसके खि़लाफ़ संघर्ष में हालांकि सदियाँ नहीं लगेंगी, फिर भी यह एक लंबी लड़ाई है। इस प्रक्रिया को तेज करने के लिए रणनीतियों की ज़रूरत है। कोई आंदोलन कितना भी क्रांतिकारी क्यों न हो, उससे समाज में कितने ही बड़े बदलाव क्यों न आए हों- इन बदलावों को लाने में जब तक महिलाएँ भी नेतृत्वकर्ता नहीं बनतीं, तब तक महिलाओं के जीवन में बदलाव न तो क्रांतिकारी होंगे और न ही स्थायी। हालाँकि इसका अपना महत्व और निहितार्थ हैं, महिलाओं की ‘भागीदारी’ मात्र अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल नहीं रहा। अब मुख्य सवाल यह है कि महिलाएँ बदलाव की प्रक्रिया को ख़ुद कितना नियंत्रित या निर्धारित कर पाती हैं, यानि वास्तव में वे कितनी सशक्त हैं। हमें आशा है कि इन नोट्स का अध्ययन हमें महिलाओं के नेतृत्व और सशक्तीकरण के सवालों से जूझने में भी मदद करेगा।
जैसे-जैसे हम इस इतिहास में आगे बढ़ते हैं, यह और अधिक स्पष्ट होता जाता है कि महिलाएँ केवल पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष या केवल आर्थिक व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में भाग लेकर मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकतीं। आर्थिक व्यवस्था को बदलने का संघर्ष पितृसत्ता और अधिरचना के विरुद्ध संघर्ष को भी शामिल करता है। पितृसत्ता के विरुद्ध महिला आंदोलन को क्रांतिकारी आंदोलन का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए। सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक शोषण व दमन के सभी रूपों को क्रांतिकारी आंदोलन द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए।
इसका मतलब यह है कि जब तक महिलाएँ सामान्य क्रांतिकारी आंदोलन के भीतर पितृसत्ता के विरुद्ध संघर्ष नहीं करतीं हैं, तब तक वे आगे बढ़कर इतिहास में अपना उचित स्थान हासिल नहीं कर सकतीं और जब तक महिलाएँ सामान्य रूप से क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा नहीं बनतीं और पितृसत्ता-विरोधी संघर्ष को उसका हिस्सा नहीं मानतीं, तब तक उनकी मुक्ति असंभव है। जहाँ भी ये दोनों संघर्ष अलग-अलग किए गए हैं, वहाँ आंदोलन संकीर्ण हो गए हैं और एक ठहराव की स्थिति में पहुँच गए हैं।
यह किताब, महिलाओं द्वारा झेली गई सैद्धांतिक और व्यावहारिक समस्याओं को समझने में भी हमारी मदद करेगी। हम उनकी सफलताओं और विफलताओं से सीख सकते हैं। सफलताओं को दोहराया जा सकता है और विफलताओं का अध्ययन कर उन्हें दूर किया जा सकता है। इसलिए इस किताब का अध्ययन केवल इतिहास जानने के लिए नहीं, बल्कि व्यवहार यानि महिला आंदोलन के लिए सही रणनीतियाँ गढ़ने में हमारी मदद के लिए भी है। हम पाठकों से अनुरोध करते हैं कि वे इस मक़सद को ध्यान में रखकर भी इस किताब को पढ़ें।
साधारण महिलाओं का यह इतिहास उन महिलाओं को एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने शोषकों का खात्मा कर मुक्ति हासिल करने की अपनी आकांक्षा को अपने और हमारे दिलों में जलाये रखा और उसे परवान चढ़ाया।




