रामराज्य का डर

मुझे राम-राज्य से डर लगता है क्योंकि…. 

वाल्मीकि के अनुसार राम के राजत्व में ही

स्वयं राम ने शंबूक का वध किया, 

सीता को प्रताड़ित किया, 

दासों, शूद्रों, आदिवासियों…. को अपमानित किया। 

गाँधी के राम-राज्य में 

शूद्र, दलित, आदिवासी, स्त्री….  

पिछड़ों में भी पिछड़े ही बने रहे और सत्ता का सुख

अगड़े, सवर्ण व वर्चस्ववादी पौरुष ही लेते रहे।

और आज के राम-राज्य में?

यहाँ तो बहुसंख्यक जनता को प्रताड़ित ही नहीं

सीधे ‘बुलडोज’ किया जा रहा है

और बाकी समाज को

नफ़रत के अफीम से मदहोश किया जा रहा है।

इसलिए राम-राज्य के इस ‘विकास’ से 

मुझे बहुत डर लगता है।

राम के जयकारों में हिंसा व दहशत झलकती है

हरपल किसी शंबूक की हत्या,

सीता की प्रताड़ना की आशंका दिखती है। 

इस आधुनिक काल में मुझे

किसी ‘राजा’ की छत्रछाया नहीं,

समता, सामंजस्य और सहिष्णुता से साँस लेता

एक लोकतांत्रिक समाज चाहिए।

जेनजी  

ये कोई अंधभक्त, पागल, गोदी

नफ़रत के नशे से चूर सांप्रदायिक युवा नहीं

यह शिक्षित, चेतन नौजवानों का जन-सैलाब है।

जो शासन की मगरूर ताकत से

डरने नहीं … उसे ललकारने आए हैं।

ऐ अहंकारी हुकूमत!

याद रखो—

आज तुमने जिन्हें घसीटा, पीटा और प्रताड़ित किया है,

कल यही प्रताड़ित व्यक्ति 

तुम्हारे सिंहासन की नींव हिला डालेंगे॥ 

नयी पीढ़ी को सलाम

डंडों, घूंसों, बूटों, ‘कमेंटों’ का जिस अंदाज में जवाब दिया, 

क्रूर पुलिसिया मानसिकता का जिस बेबाकी से पर्दाफ़ाश किया,

दमन के खतरनाक इरादों का जैसा मज़ाक उड़ाया, 

और अहंकारी सत्ता को घुटनों पर ला टिकाया,

गोदी मीडिया के रचे प्रपंचों को जैसे नंगा किया,

उत्पीड़न-दमन को जिस ढंग से हँसी-ठठ्ठे में उड़ाया,

सचेतन भारत-भारतीयता की जो बुलंद झलक दिखाई,

न्यायोचित माँगों पर जो संकल्प, एकता और बंधुता दर्शायी….

ऐ नयी पीढ़ी!

तुम्हारी उस ज़िद, तेवर और इस बुलंद जज़्बे को 

सलाम/नमस्ते/ प्रणाम!

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