अंग्रेज़ी राज में शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी चढ़ाने के काफी पहले ही 16 वर्षीय क्रांतिकारी खुदीराम बोस को 11 अगस्त 1908 को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था। उनकी याद में बंगाल भर में गए जाने वाले गीत “ए बार बिदाई दे मां, घुरे आशी” की अंतिम लाइनों में खुदीराम बोस अपनी मां को आश्वासन देते हैं कि “कुछ समय बाद मैं फिर से जन्म लूंगा, अगर तुम्हें मुझे पहचानने में दिक्कत हो तो मेरे गले पर पड़े फांसी के फंदे के निशान से मुझे पहचान लेना”।
खुदीराम बोस अपने गले में फांसी के फंदे का निशान लेकर जन्मे या नहीं, यह तो किसी ने नहीं देखा, लेकिन यह सबके सामने है कि अंग्रेजों के बाद हमारे देश में जो कमज़ोर सा लोकतंत्र जन्मा, उसके गले में फांसी के फंदे के ढेरों निशान हैं। न सिर्फ निशान हैं बल्कि खून के ताजे छींटें भी हैं।
नेशनल लॉ युनिवर्सिटी दिल्ली के आंकड़ों के अनुसार 1947 के बाद से अब तक कुल 752 लोगों को फांसी पर लटकाया जा चुका है और इस समय कुल 400 से 500+ लोग फांसी की सज़ा पाने की कतार में हैं। जबकि सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1947 के बाद कुल 57 लोगों को मौत की सज़ा के तहत फांसी पर लटकाया गया। मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर) के अनुसार 1953 से 1963 के बीच मात्र एक दशक के अंदर भारत के 16 राज्यों के कुल 1,422 लोगों को फांसी पर लटकाया गया।
इनमें से जो भी आंकड़ा सही हो, यह बात तो सही है कि भारतीय लोकतंत्र अंग्रेज़ी राज के बनाए हुए रास्ते पर ही चल रहा है और इसकी गर्दन पर भी खून के गहरे/ ताज़े निशान हैं। बीच-बीच में मौत की सज़ा के खिलाफ चर्चा होती रहती है, लेकिन भारत सरकार अंग्रेजों के बनाए कानून और रास्ते को नहीं छोड़ रही है।
16 दिसंबर 2020 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मौत की सज़ा पर रोक लगाने का प्रस्ताव पारित किया, जिसके पक्ष में 123 देशों ने वोट किया। इस प्रस्ताव के विरोध में यानि मौत की सज़ा के पक्ष में कुल 38 देश थे, जिसमें अमेरिका के साथ भारत भी शामिल था। जबकि भारत में दशकों से मौत की सज़ा बंद करने के लिए बहस चल रही है, लेकिन भारत सरकार इसे “जघन्य से जघन्यतम” मामलों में लागू करने का हवाला देकर इसे खत्म न करने पर अड़ी हुई है।
हाल ही में 2013 के झीरम घाटी हमले में 10 व्यक्तियों को फांसी की सज़ा सुनाई गई और सरकारी हलकों में “न्याय होने” की खुशी मनाई गई। इसके बाद से फांसी की सज़ा पर बहस एक बार फिर से तेज़ हो गई है। मानवाधिकार संगठनों, जिसका हिस्सा मैं भी हूं, की इस बार कोशिश होनी चाहिए़ कि इस बहस को बहस की परिधि से बाहर ले जाकर मौत की सज़ा ख़त्म करने तक पहुंचाया जा सके।
झीरम घाटी हमला मामले में फांसी की सज़ा पाने वाले लोग देश के सबसे पिछड़े इलाके के, सबसे पिछड़े तबके के सबसे गरीब लोग हैं। इन 10 लोगों में दो महिलाएं भी हैं। इनके नाम हैं प्रमिला मोडियम, सुमित्रा पुनेम मोडियम (दोनों महिलाएं) चैतु लेकाम, मुक्का मंडावी, कवासी कोसा, आयता मरकाम, मड़कामी देवा, जोगा मड़कम, बंजामी सन्ना, महादेव नाग। इन्हें फांसी की सज़ा सुनने वाले जज का नाम है अजय सिंह राजपूत और इस मुकदमे की कोर्ट में पैरवी करने वाली एजेंसी है – एनआईए। इस मुकदमे का इतना तथ्य भी बहुत कुछ कह देता है।
यह घटना रात के समय की है, जिसमें 200-300 या उससे अधिक लोगों ने रात के अंधेरे में हमला किया, जिसका कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पहले से ही इस मुकदमे को लेकर आशंका जताते हुए कहा था, कि झीरम घाटी हत्याकांड के पीछे के साजिशकर्ताओं तक पहुंचने के लिए कोई ठोस जांच नहीं की गई। बेला भाटिया ने अपने इंटरव्यू में कहा कि घटना के बाद पुलिस ने आसपास के लोगों को DRG के लोगों के कहने पर गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तार लोगों में एक महिला अपने बचपन में ‘चेतना नाट्य मंडली’ से जुड़ी थी, इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया, एक जवान लड़का उस गांव में शादी में शामिल होने आया था, उसे गिरफ्तार कर लिया गया, एक भूतपूर्व सरपंच को गिरफ्तार कर लिया। 200 से 300 लोगों के इस हमले में इन 10 लोगों ने ही हमले की साजिश रची, मुकदमे के दौरान यह भी साबित नहीं हो सका। गिरफ्तार लोग मौत की सज़ा पाने के पहले बिना जमानत के 13 साल से जेल में हैं, आगे के साल वे मौत की सज़ा के दबाव की यातना में व्यतीत करेंगे, यह अपने आप में ही उनके प्रति एक अपराध है।
बेला भाटिया कहती हैं कि बस्तर में आदिवासियों की 99% प्रतिशत गिरफ्तारियों ऐसे ही फर्जी होती हैं और अपना केस लड़ना तो दूर, उसे समझ भी न पाने के कारण वे सालों साल तक जेल में पड़े रहते हैं। लेकिन यहां हम इन सर्वविदित फ़र्ज़ी गिरफ्तारियों पर नहीं जाएंगे, बल्कि मौत की सज़ा पर बात करेंगे।
किसी भी समाज व्यवस्था में मौत की सज़ा ही नहीं होनी चाहिए़। इसकी मुख्य तौर पर तीन मुख्य वजहें हैं। पहली तकनीकी वजह और दूसरी सैद्धांतिक और तीसरी राजनीतिक। पहले हम तकनीकी वजहों पर बात करते हैं।
मौत की सज़ा के खिलाफ तकनीकी पहलू
न्याय का सिद्धांत है कि “100 दोषी छूट जाएं, लेकिन एक भी निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए़।” यह कहे जाने का अर्थ है न्यायालय की प्रक्रिया में मानवीय भूलें भी हो सकती हैं, इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए़ कि किसी भी निर्दोष को सज़ा न हो। और जब वह सज़ा मौत की हो तो ? तब इन मानवीय भूलों को कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि मरने के बाद कोई जिंदा नहीं हो सकता। जैसे-जैसे न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है, मानवीय भूलें सोची समझी साजिशों में बदलने लगी है। बलवान, धन और पावर के बल पर सबूत गढ़ और मिटा सकता है। वह वकील ही नहीं, न्यायाधीश को भी खरीद सकता है, उस पर दबाव डाल सकता है। और जब एक पक्ष सत्ता हो, तो उसके दबाव के गुरुत्वाकर्षण को समझना मुश्किल नहीं है। ऐसी न्यायिक व्यवस्था में मौत की सज़ा को मान्यता देकर उसे बनाए रखना कमजोर, गरीब लोगों को आसानी से दोष सिद्धि ही नहीं मौत की सज़ा तक पहुंचा देता है। नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली की डेथ पेनाल्टी इंडिया रिपोर्ट के अनुसार मौत की सज़ा पाने वाले 74.1% लोग कमज़ोर आर्थिक वर्ग से आते हैं। और भारत के ब्रह्मणवादी हिंदुत्ववादी फासीवादी चरित्र के कारण जो शेष बचते हैं, वो या तो मुसलमान हैं या दलित या आदिवासी।
अमेरिका के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका में 1973 से अब तक मौत की सज़ा पाए 200 लोगों को ऊपरी अदालत में निर्दोष पाया गया और उन्हें रिहा कर दिया गया। इनमें से कुछ को तो उनके मरने के बाद बरी किया गया। मौत की सज़ा का इंतज़ार करते हुए जीना भी एक यातना है। अमेरिका में इंतज़ार का यह औसत समय 11 साल का है, कहीं कहीं यह 17 साल भी बताया जाता है। जब कोई जज फांसी की सज़ा सुनाता है, तो वास्तव में वह इन न्यायिक कमियों और मानवीय भूलों को नज़रअंदाज करता है और अक्सर उसकी अपनी मानसिक बुनावट भी इसमें गंभीर रूप में काम करती है। तानाशाही की ओर बढ़ते इस समय में अब तो इस तरह के कानून लाये जा रहे हैं, जिनमें निर्दोष पर निर्दोष साबित करने का भार डालकर व्यक्ति को कानून के नीचे दबा दिया गया है। मौत की सज़ा को बरकरार रखने का मतलब है कि यह मान लिया गया है कि सभी कानून बिल्कुल परफेक्ट बने हैं और देश की न्यायिक प्रणाली बिल्कुल परफेक्ट तरीके से काम कर रही है। जबकि कोई भी सामान्य इंसान इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हो सकता। इसलिए ऐसे समाज व्यवस्था में मौत की सज़ा कतई मंजूर नहीं की जानी चाहिए़।
झीरम घाटी वाले जजमेंट में जज ने फांसी की सज़ा सुनाकर भी इस फैसले की पुष्टि के लिए जिस तरह हाईकोर्ट जाने की बात कही है, उससे ही साफ हो जाता है कि उसके ऊपर कोई दबाव काम कर रहा था। इस दबाव को समझना मुश्किल भी नहीं है। माओवाद का खात्मा करते हुए “दिखना” मौजूदा सरकार के एजेंडे का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मौत की सज़ा को ख़ारिज करने के सैद्धांतिक पहलू
मौत की सज़ा को नकारने का दूसरा कारण सैद्धांतिक है।
दूसरी तरह से कहें तो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को सैद्धांतिक तौर पर मौत की सज़ा का विरोध करना ही चाहिए़।
क्योंकि भारत सहित हर लोकतांत्रिक देश यह मानते हैं कि उसके कानून सुधारात्मक हैं प्रतिशोधात्मक नहीं। यानि कानून का मकसद अपराध करने वाले व्यक्ति में सुधार लाना है, न कि उससे संस्थानिक बदला लेना। भारत में जेलों के नाम के आगे भी इसी कारण “सुधार गृह” लिखा जाता है। बदला लेना बर्बर और पिछड़े समाज की निशानी है, जहां मानवीय मूल्यों का विकास नहीं हुआ था। लेकिन सज़ा को “सुधारात्मक” मानने के बाद भी मौत की सज़ा को बरकरार रखना, खुद उस समाज के बारे में यह टिप्पणी करता है कि उसके मानवीय मूल्य अभी पिछड़े सामंती समय में ही ठहरे हुए हैं।
सच्चाई यह भी है कि मौत की सज़ा उस ठहरे हुए पिछड़े मानवीय मूल्य वाले समाज को और अधिक पिछड़ा और हिंसक बनाती है। किसी जघन्यतम आपराधिक घटना में जब लोग विरोध प्रदर्शनों में फांसी की सज़ा की मांग करते हैं तो यह सिर्फ घटना के प्रति उनके गुस्से का ही प्रकटन नहीं होता, बल्कि व्यक्ति की हत्या की मांग करने वाले दिमाग के हिंसक होने का भी प्रमाण देता है। जब लोग किसी के फांसी की सज़ा के लिए या फांसी होने पर जश्न मनाते हैं (जैसा कि अफजल गुरु की फांसी के समय किया, जैसा कि बहुत से लोगों ने झीरम घाटी फैसले के समय किया) तो वास्तव में यह उस समाज के ढेरों दिमागों का एक हत्या के लिए तैयार/तत्पर होने का प्रकटन करते हैं, वे दिखाते हैं कि उनका दिमाग अभी मानवीय संवेदना के उच्च पायदान पर नहीं पहुंच सका है और ऐसे ही ढेरों दिमाग मिलकर जब समाज बनाते हैं तो वह समाज एक हिंसक समाज बनता है। ऐसे समाज में हत्या की घटनाएं और जघन्यतम हत्या की घटनाएं बढ़ती ही रहती है, रुकती नहीं है। व्यवस्था मौत की सज़ा देते जाएगी और जघन्यतम घटनाएं भी होती जाएंगी क्योंकि सत्ता व्यवस्था समाज को मानवीय बनाने के लिए कोई प्रयास करना तो दूर, उसे क्रूर बनाने वाली नीतियां बनाती और लागू करती जा रही है, जिसमें एक मौत की सज़ा भी है।
सैद्धांतिक तौर पर किसी को भी मौत की सज़ा इसलिए भी नहीं दी जानी चाहिए़ क्योंकि ऐसे हिंसक और क्रूर समाज में किसी अकेले व्यक्ति को फांसी की सज़ा देना उस व्यक्ति के साथ अन्याय है। किसी व्यक्ति की, या किसी आपराधिक मनोवृत्ति के व्यक्ति की निर्मिति अकेले नहीं होती, बल्कि उसके आसपास के समाज में होती है, जिसके अपने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असर होते हैं। जिस समाज में औरतों के प्रति घटिया नज़रिया हो, वहां बलात्कारी मर्द ही पैदा होंगे, जिस समाज में धार्मिक जातीय लिंचिंग आम हो, वहां हत्यारे ही पैदा होंगे और जिस समाज में राजकीय दमन बेकाबू हो, वहां विरोधी और विद्रोही ही पैदा होंगे। जब समाज में पितृसत्ता औरतों का जीना मुश्किल कर देंगी, महिलाएं भी अपने बचाव में बहुत सारे ऐसे काम करेंगी, जो कानून की नज़र में अपराध ही होगा। जबकि जज जब किसी अपराध पर किसी व्यक्ति को सज़ा सुनाता है तो वह केवल व्यक्ति पर फोकस रखता है न कि उन सामाजिक आर्थिक स्थितियों पर, जिनकी वजह से व्यक्ति ने अपराध किया। यह अधूरा न्याय है। जिसमें सामाजिक व्यवस्था को हर बार बरी कर दिया जाता है, उसे दंड देने या सुधारने का कोई फैसला नहीं सुनाया जाता। जब तक ऐसी हिंसक, सामंती, पितृसत्तात्मक, धार्मिक और जातीय तौर पर असहिष्णु, अपराध को पूजने वाली सत्ता मौजूद है, मौत की सज़ा देना अपने आप में एक बड़ा अपराध है, जिसे यह समाज व्यवस्था करती ही जा रही है।
मौत की सज़ा के राजनीतिक पहलू
मौत की सज़ा वस्तुत: जघन्यतम अपराधों के लिए नहीं बनाई गई है, क्योंकि जघन्यतम अपराध करने वाले अपराधी तो संसद में बैठे हैं, मौत की सज़ा वास्तव में अपने विरोधियों को खत्म करने के लिए बनाई गई है। ब्रूनो से लेकर स्पार्टकस से होते हुए भारत में मंगल पांडे, खुदीराम बोस, सिद्धू कानू, बिरसा मुंडा, वीर नारायण सिंह, अशफाकुल्ला, राम प्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव और कय्यूर के 4 क्रांतिकारी, आज़ाद भारत में भुमैय्या और किस्ता गोंड से लेकर मकबूल भट, अफ़ज़ल गुरु से लेकर झीरम घाटी के 10 आदिवासियों (जिन्हें अभी मौत की सज़ा सुनाई भर गई है) तक सभी, जिन्हें मौत की सज़ा से नवाज़ा गया, सत्ता व्यवस्था के राजनैतिक विरोधी रहे हैं। वास्तव में अब तक की सत्ता व्यवस्था ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए, अपने राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने के लिए हत्या को कानूनी जामा पहनाने के लिए फांसी की सज़ा की कानूनी व्यवस्था की है। फांसी की सज़ा वास्तव में व्यवस्था विरोधियों पर सत्ता के वर्चस्व की घोषणा है। यह समाज में व्यवस्था बनाए रखने के लिए ईजाद की गई कानून की व्यवस्था नहीं, बल्कि विरोधियों को सबक सिखाने की सत्ता की राजनीतिक हनक का प्रतीक है। जबकि सच्चाई यह है कि समाज जबसे अस्तित्व में आया है, वह बदलता रहा है। इसकी जड़ता की खत्म करने वाले लोग समाज में हमेशा पैदा होते रहे हैं, इसलिए ही समाज आगे बढ़ता रहा है। फांसी पर चढ़ाए गए ऊपर दिए गए सभी लोगों के नाम पढ़ें, ये लोग किसी अपराध के लिए नहीं, बल्कि समाज को आगे ले जाने की दिशा दिखाने वाले लोग थे। फांसी की सज़ा का इसलिए पुरजोर विरोध होना चाहिए़ कि उसने समाज से अपराध को खत्म नहीं किया, बल्कि इसने अब तक समाज के अगुवा तत्वों को खत्म किया है। यह सज़ा राजकीय सत्ता की यह घोषणा है कि जनता के जीवन पर अंतिम दावा राज्य का होगा। यह विचार ही अपने आप में लोकतंत्र की भावना के खिलाफ है। किसी भी राज्य व्यवस्था के पास यह शक्ति नहीं होनी चाहिए़।
क्रांतिकारी कवि वरवर राव, भुमैया और किस्ता गौड़ की फांसी पर लिखी अपनी डायरी ” एबोलिश डेथ पेनाल्टी” में लिखते हैं, “वह कैसा समाज होगा, जो अपने सबसे कमिटेड डिसेंटर (प्रतिबद्ध विरोधी) की कानून के नाम पर हत्या करता है?” झीरम घाटी में 10 आदिवासियों को मौत की सज़ा का फरमान इसी धारणा के आधार पर सुनाई गई है, कि वे सत्ता के “कमिटेड डिसेंटर” हैं। इन कमिटेड डिसेंटर के साथ यह भी जुड़ जाता है कि वे भारत के सबसे उपेक्षित इलाके के हैं, आदिवासी हैं और सबसे गरीब हैं।
झीरम घाटी मुकदमे के 10 आदिवासियों की मौत की सज़ा के खिलाफ साथ ही लोकतंत्र की गर्दन पर पड़े फांसी के निशान को खत्म करने के लिए, इस पर फिर से पड़ने वाले खून के धब्बों को रोकने के लिए सभी को आगे आना ही होगा, वरना यह निशान और धब्बे ही एक दिन इस लोकतंत्र का गला पूरी तरह घोंट देंगे।




